Monday, March 16, 2020

कालसर्प योग / सर्प योग- पालक या संघारक

कालसर्प योग / सर्प योग- पालक या संघारक

 वास्तव में राहु केतु छाया ग्रह हैं उनकी अपनी और दृष्टि नहीं है,  राहु का जन्म नक्षत्र भरणी, तथा केतु का नक्षत्र अश्लेषा कहा गया है।

राहु के जन्म नक्षत्र भरनी के देवता काल और केतु के जन्म नक्षत्र आश्लेषा के देवता सर्प हैं अतः इसी से इसे सर्प शाप के कारण नाम को बदल कर काल सर्प कर दिया गया है जबकि पुराने किसी भी शास्त्र में काल सर्प योग नाम का कोई शब्द नहीं सर्प योग है।

 बृहत पाराशर होरा शास्त्रम ग्रंथ के पूर्वजन्म शापद्योतकध्याय: अध्याय में सर्प योग, अनापत्त योग, पित्र शाप आदि सभी शापो के बारे में विस्तृत जानकारी देकर उनसे होने वाली परिणामों के निवारण एवं उपाय भी बताए हैं।

 वराह मिहिर ने अपनी संहिता में जातक नभ संयोग में सर्प का उल्लेख किया है जबकि काल सर्प योग का नाम ही नहीं है।

 महर्षि पाराशर एवं वराहमिहिर ने प्राचीन ज्योतिष आचार्यों ने सर्प योग को माना है और अपने ग्रंथों में इसका जिक्र किया है।

ये काल सर्प योग आधुनिक विद्वानों द्वारा बनाया बदला हुआ सर्प योग ही है। ये शब्द कुछ ही वर्षो पहले अवतरित हुआ है जबकि सर्प योग हमेशा से ही है।

काल सर्प योग को मीडिया आदि दूसरे माध्यम से इतना महिमा मंडित करके बताया गया है जिससे कली काल मे दुखी जातक और दुखी हो जाये।

सर्प दोष की शांति हमेशा से ही हुई है पर काल सर्प योग नाम ही इतना खतरनाक है जिससे जातक डर से अपना आत्म विश्वर भी खो देता है।

 महर्षि पराशर, भृगु, कल्याण बर्मा, बादरायण, गर्ग, मणिप्त आदि ने सर्प योग सिद्ध किया है।

काम रत्न के अध्याय 14 के श्लोक 41 में राहु को काल कहा गया है।  श्लोक 50 में आगे लिखा हुआ है, काल अर्थात मृत्यु।

 मानसागरी के चौथे अध्याय (4) का दसवां(10) श्लोक कहता है -  शनि, सूर्य और राहु जन्मांग में लग्न में सप्तम भाव में होने पर सर्पदंश होता है।

 हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथों में राहु के देवता काल अवधि देवता माना गया है, किसी भी ग्रह की पूजा के लिए उस ग्रह के देवता तथा प्रत्याशी देवता का पूजन अनिवार्य है।

राहु के गुण अवगुण शनि जैसे हैं। शनि आध्यात्मिक चिंतन, दीर्घ विचार एवं गणित के साथ आगे बढ़ने का गुण अपने पास रखता है।

राहु मिथुन राशि में उच्च का, धनु राशि में नीच का और कन्या राशि में शुभ होता है।
शनि बुध राहु के मित्र हैं तथा गुरु सैम ग्रह है।

आधुनिक विद्वानों ने ज्योतिष शास्त्र में संशोधन करने वाले आचार्य ने सर्प का मुँह राहु और पूंछ केतु इन दोनों के बीच में सभी ग्रह रहने पर निर्माण होने वाली ग्रह स्थिति को कालसर्प योग कहा है। यह कालसर्प योग मूल सर्प योग का प्रतिरूप है।

इनमे से कुछ विशेष लोगो की जन्मपत्री में काल सर्प योग / सर्प योग है, इसका ज्ञान आज कल के ब्राह्मणों को भी कम ही दिखता है -

 अब्राहम लिंकन एवं पंडित जवाहरलाल नेहरू के उदाहरण हैं, दोनो महानुभावों का जन्म इसी सर्प योग में हुआ है।

चतुर्थ,अष्टम, द्वादश स्थान में राहु और कुंडली में कालसर्प योग हो तो नकारात्मक होगा।

रिलायंस इंडस्ट्रीज के उद्योगपति धीरुभाई अंबानी का जन्म पत्री ने 18 वर्षों में ही धीरुभाई को शून्य से ब्रह्मांड तक प्राप्त करा दिया। इन दोनों दशकों से राहु ने उन्हें खूब दिया।

देश के चर्चित लोगो की पत्री में सर्प योग रहा है, श्री जवाहरलाल नेहरू जी, श्री मोरारजी देसाई जी की पत्री में सर्प योग है। महाराष्ट्र के भूतपूर्व मुख्यमंत्री श्री अब्दुल रहमान अंतुले, भूत पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर जी, आचार्य रजनीश (ओशो), सुर सम्राट श्रीमती लता मंगेशकर जी, राम कथा वाचक श्री मुरारी बापू जी तथा महानायक श्री अमिताभ बच्चन जी की जन्मपत्री में कालसर्प योग है।

बहुत से ऐसे लोग हैं जिनकी पत्री में सर्प योग रहा है, ये भी कहा जा सकता है कि राहु जातक से इतनी तपस्या, साधना करवाकर उन्हें बुलंदिया तक पहुचने में सक्षम है। जिनके भी नाम ऊपर लिखे हैं उन्होंने इतिहास लिखे हैं जिसमे संशय नहीं।

जन्मांग के चतुर्थ भाव में राहु ने हर्षद मेहता  मटियामेट कर दिया। राहु की महादशा में शुक्र का समय उनके लिए सर्वोत्तम फलदाई रहा, किंतु सूर्य की अंतर्दशा शुरू होते ही राहु केतु का गोचर भ्रमण शुरू होते ही उनकी धरपकड़ मजबूत हुई, और उनके सभी रहस्यों का पर्दाफाश हो गया।

 वराह मिहिर में अपने संहिता के जातक नभ संयोग में सर्प योग का उल्लेख किया है। कल्याण वर्मा ने अपनी बहुमूल्य रचना सारावली में सर्प योग की विषद व्याख्या की है।

 शांति रत्नम  ने सर्प योग को ना केवल मान्यता ही नहीं अपितु सर्प शांति को जातक के लिए परम शांति देने वाला बताया हैl

काल सर्प / सर्प योग के प्रकार

 सर्प योग 12 प्रकार के होते हैं, परंतु व्यावहारिक लक्षणों से पता चला है कि अलग-अलग लखनऊ में घटित होने के कारण अलग-अलग प्रकार के सर्प योग घटित होते हैं।  राहु की 12 भाव में 12 स्थितियों से 12 तरीके के सर्प योग बनते हैं।

*राहु केतु के मध्य सभी ग्रहों का आ जाना काल सर्प या सर्प योग कहलाता है। ये 2 प्रकार के भी हो सकते हैं।

1. खंडित काल सर्प योग
2. अखंडित काल सर्प योग

तथा 2 तरह से भाव स्पष्ट करते हैं -

1. उदित काल सर्प योग
2. अनुदित काल सर्प योग

इन सभी को देखकर ही निर्धारित किया जाएगा कि सर्प योग प्रभावी रहेगा भी या नहीं।*


राहु केतु विभिन्न भाव में स्थित होकर 12 प्रकार के कालसर्प दोष का निर्माण करते हैं। वैसे तो भारतीय ज्योतिष में 144 तरह का कालसर्प योग होता है किंतु 12 तरह के कालसर्प योग अति प्रसिद्ध है। शास्‍त्रों के अनुसार राहु और केतु 180 डिग्री में होते हैं और जब इन के मध्य में समस्त 7 ग्रह आ जाते हैं तो कालसर्प योग बनता है। आइए जानें कि इन 12 में से कौन सा कालसर्प दोष किस भाव में होता है।

1 अनंत कालसर्प योग

राहु लग्न में हो और केतु सप्तम भाव में स्थित हो तथा सभी अन्य ग्रह सप्तम से द्वादश, एकादशी, दशम, नवम, अष्टम और सप्तम में स्थित हो तो यह अनंत कालसर्प योग कहलाता है।

2 कुलिक कालसर्प योग

राहु द्वितीय भाव में तथा केतु अष्टम भाव में हो और सभी ग्रह इन दोनों ग्रहों के बीच में हो तो कुलिक नाम कालसर्प योग होगा। 
3 वासुकी कालसर्प योग

राहु तृतीय भाव में स्थित है तथा केतु नवम भाव में स्थित होकर जिस योग का निर्माण करते हैं तो वह दोष वासुकी कालसर्प दोष कहलाता है।

4 शंखपाल कालसर्प योग

राहु चतुर्थ भाव में तथा केतु दशम भाव में स्थित होकर अन्‍य ग्रहों के साथ जो निर्माण करते हैं तो वह कालसर्प दोष शंखपाल के नाम से जाना जाता है। 

5 पद्य कालसर्प योग

चतुर्थ स्‍थान पर दिए दोष के ऊपर का है पद्य कालसर्प दोष इसमें राहु पंचम भाव में तथा केतु एकादश भाव में साथ में एकादशी पंचांग 8 भाव में स्थित हो तथा इस बीच सारे ग्रह हों तो पद्म कालसर्प योग बनता है।

6 महापद्म कालसर्प योग

राहु छठे भाव में और केतु बारहवे भाव में और इसके बीच सारे ग्रह अवस्थित हों तो महापद्म कालसर्प योग बनता है।

7 तक्षक कालसर्प योग

जन्मपत्रिका के अनुसार राहु सप्तम भाव में तथा केतु लग्न में स्थित हो तो ऐसा कालसर्प दोष तक्षक कालसर्प दोष के नाम से जाना जाता है। 

8 कर्कोटक कालसर्प योग

केतु दूसरे स्थान में और राहु अष्टम स्थान में कर्कोटक नाम कालसर्प योग बनता है।

9 शंखचूड़ कालसर्प योग

सर्प दोष जन्मपत्रिका में केतु तीसरे स्थान में व राहु नवम स्थान में हो तो शंखचूड़ नामक कालसर्प योग बनता है।

10 घातक कालसर्प योग

कुंडली में दशम भाव में स्थित राहु और चतुर्थ भाव में स्थित केतु जब कालसर्प योग का र्निमाण करता है तो ऐसा कालसर्प दोष घातक कालसर्प दोष कहलाता है। 

11 विषधर कालसर्प योग

केतु पंचम और राहु ग्यारहवे भाव में हो तो विषधर कालसर्प योग बनाते हैं।

12 शेषनाग कालसर्प योग

कुंडली में राहु द्वादश स्थान में तथा केतु छठे स्थान में हो तथा शेष 7 ग्रह नक्षत्र चतुर्थ तृतीय और प्रथम स्थान में हो तो शेषनाग कालसर्प दोष का निर्माण होता  है।

काल सर्प योग / सर्प योग को अधिक अशुभ बनाने वाले महत्वपूर्ण योग निम्नलिखित हैं-

रवि - राहु युति या रवि - केतु युति  ग्रहण योग।
चंद्र - राहु युति चंद्र ग्रहण योग।
मंगल - राहु युति अंगारक योग।
बुध - राहु युति जड़त्व योग।
गुरु -  राहु युति चांडाल योग।
शनि - राहु युति नंदी योग एवं प्रेत योग बनाती है।

केंद्र में स्वग्रही या उच्च का गुरु, शुक्र, शनि, मंगल, रवि, चंद्र इनमें से कोई ग्रह स्वग्रही होकर उच्च का हो तो काल सर्प योग / सर्प योग भंग होता है। केंद्र में भद्र योग, बुधादित्य योग, लक्ष्मी योग, शश योग, मालव्य योग तथा पंच महापुरुषों में से कोई भी योग हो तो काल सर्प / सर्प योग भंग होता है l

उपाय एवं फल

 कहने का तात्पर्य है कि किसी भी तरह का पूजा-पाठ कभी निषेध नहीं जाता, वह उच्च फलदायक ही होता है। परंतु आधुनिक ज्योतिषी और विद्वानों ने कालसर्प योग के नाम को सर्प योग ना लिखकर  इतना डरावना बना दिया है कि लोग डरते और परेशान हो जाते हैं।

सर्प योग की शांति अति आवश्यक है ये सत्य है। याद रहे सर्प योग हमेशा प्रभावी नहीं रहता। जब कभी गोचर में सर्प योग बनता है तभी ये सक्रिय रहता है।

महादेव शिव का पूजन करने से सभी तरह के कुयोगों की शांति होती है क्योंकि शिव ने अपने मस्तक पर सर्प को स्थान दिया है। अतः तीन सावन लगातार शिवपूजन करके शिव का रुद्राभिषेक करने से तथा चौथे साल पूजन कराकर श्री हत्या हरण कुंड में स्नान करके एक सांप का चांदी का जोड़ा सहित गंगा में प्रवाहित कर ,पूर्ण कपड़ों से स्नान करके सारे कपड़े वहीं छोड़कर, कुछ भिखारियों को भोजन करने से सर्प योग के दुष्परिणामों को कम किया जा सकता है।

याद रहे ये दोष समाप्त नहीं किया जा सकता पर कुप्रभाव को कम किया जा सकता है।

राहु की शांति तथा चंद्रमा की शांति अति आवश्यक होगी अतः इनका दान जप भी श्रेष्ठ होगा।

गरीबो की सहायता करने से उनकी दवाई, भोजन दान देने से राहु शांत होते हैं। ये अचूक उपाय है।

 4 या 12 अमावस्या को गंगा स्नान कर तर्पण करने से पित्र दोष, गरीबो को भोजन कराने से, चिड़ियों को दाना खिलाने से अनेक तरह के इस तरह के कुयोगों में शांति आती है।

परिवार के किसी सदस्य की लंबी चल रही बीमारी को कुछ कम करने के लिए जातक के ऊपर से एक मुट्ठी बाजरा 7 बार उल्टा उतार कर चिड़ियों को खिला दीजिये क्योंकि वो ये ग्रहण करने में सक्षम है तथा दक्षिण दिशा की तरफ़ सरसो के तेल का दिया जलाने से बीमारी जाती रहती है।

गुरु संबंधी चीज़ों का दान करने से माता पिता के स्वास्थ्य संबंधी लाभ मिले तथा जिस जातक का पढ़ाई लिखाई में मन न लग रहा हो उन्हें पिता किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई में सहयोग करे, परिणाम स्वरूप  जातक पढ़ाई शुरू कर देगा।

अधिक जानकारी के लिए जातक अपनी जन्मपत्री किसी ब्राह्मण को दिखाए तथा कुयोगों से बने अरिष्टों से बचे। इस तरह के किसी भी योग से डरने की आवश्यकता नहीं परन्तु शुभ कार्य करने की आवश्यकता है।

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार
(एम0 ए0, एम0 बी0 ए0, पी0 एच0 डी0, शास्त्री ( ज्योतिष )

सोम शीतलाष्टमी तथा कालाष्टमी 16 मार्च 2020

होली के आठवें दिन बसौड़ा व्रत किया जाता है, जिसे शीतला अष्टमी व्रत भी कहा जाता है। सोमवार को ये तिथि होने पर अधिक शुभ फलदायी हो जाती है।
यह व्रत माता शीतला को समर्पित है। यह व्रत होली के आठवें दिन होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, प्रति वर्ष शीतला अष्टमी का व्रत चैत्र माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को होता है।

ज्योतिष शास्त्र में शीतला माता चर्म, खाल, चर्म संबंधी रोग जैसे फोड़े, फुंसी, दाने, चेचक से संबंधित होती हैं। बासोड़ा वाले दिन भगवती की पूजा का विधान है जिसमे माँ को नीम की पत्ती सफेद मिठाई का भोग लगाकर प्रसाद प्राप्त किया जाता है। इस विशेष दिन में पूजा पाठ करने से जातक चर्म संबंधी सभी बीमारियों से दूर रहता है।

इस बार 16 मार्च 2020 को सोम शीतलाष्टमी का व्रत और पूजन होगा।

सोम शीतलाष्टमी पर शीतला माँ की पूजा का मुहूर्त सुबह 6:46 बजे से शाम 06:48 बजे तक है।

 सोम शीतलाष्टमी का महत्व

अष्टमी के दिन पहले बनाये हुए बासी पकवान ही देवी को नैवेद्ध के रूप में समर्पित किए जाते हैं। इसके पीछे तर्क यह है कि इस समय से ही बसंत की विदाई होती है और ग्रीष्म का आगमन होता है, इसलिए अब यहां से आगे हमें बासी भोजन से परहेज करना चाहिए।


स्कंद पुराण में माता शीतला का वर्णन है,  उनके स्वरूप का वर्णन करते हुए बताया गया है कि माता शीतला अपने हाथों में कलश, सूप, झाडू और नीम के पत्ते धारण किए हुए हैं। वे गर्दभ की सवारी किए हुए हैं। शीतला माता के साथ ज्वरासुर ज्वर का दैत्य, हैजे की देवी, चौंसठ रोग, घेंटुकर्ण त्वचा रोग के देवता एवं रक्तवती देवी विराजमान होती हैं।

प्रातः जल्दी उठें और सूर्योदय से पहले स्नान करें। शीतलाष्टक का पाठ शुभकर रहे। प्रसाद में दही, राबड़ी, गुड़ और कई अन्य आवश्यक वस्तुएं शामिल करें। शाम को पूजा के बाद व्रत खोलें।

शीतलाष्टमी तथा कालाष्टमी पर भैरव उपासको के लिए भैरव पूजा मुहूर्त:

कालाष्टमी प्रारम्भ -  16 मार्च 2020 से सुबह 3 बजकर 19 मिनट से अगले दिन
कालाष्टमी समाप्त - 17 मार्च 2020 सुबह 2 बजकर 59 मिनट तक

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से

Friday, March 13, 2020

14 मार्च से लग रहा है खरमास, बंद हो जाएंगे मांगलिक कार्य नहीं गूंजेगी शहनाई


खरमास (14 मार्च मीन संक्रांति 2020)

14 मार्च से लग रहा है खरमास, बंद हो जाएंगे मांगलिक कार्य नहीं गूंजेगी शहनाई

धनु एवं मीन राशि में सूर्य देव के प्रवेश करने से खरमास लगता है। इस वर्ष 14 मार्च दिन शनिवार को खरमास लग रहा है, जो एक माह तक रहेगा। इस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किए जाएंगे। इस दौरान विवाह भी नहीं होगा। खरमास के समय आप को भगवान सूर्य और श्री हरि विष्णु की आराधना करनी चाहिए।

खरमास लगने का समय-

इस वर्ष मार्च में खरमास 14 मार्च को लगेगा। इस दिन दोपहर 02 बजकर 23 मिनट पर सूर्य देव मीन राशि में प्रवेश करेंगे। 14 मार्च 2020 से 13 अप्रैल तक खरमास रहेगा।

खरमास समाप्ति का समय-

इस वर्ष खरमास 14 मार्च से 13 अप्रैल तक है, जो एक माह के लिए रहेगा। 14 अप्रैल से विवाह, मुंडन, हवन, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य प्रारंभ हो जाएंगे।

वर्ष 2020 में विवाह के मुहूर्त-

★अप्रैल: चौथे माह में विवाह के लिए केवल 4 शुभ मुहूर्त है। 14, 15, 25 और 26।

★मई: इस माह में शादी के लिए कुल 16 मुहूर्त हैं। 1, 2, 3, 4, 6, 8, 9, 10, 11, 13, 17, 18, 19, 23, 24 और 25।

★जून: जून में विवाह के लिए विवाह के 9 मुहूर्त हैं। 13, 14, 15, 25, 26, 27, 28, 29 और 30।

★नवंबर: साल के 11वें माह में विवाह के केवल 3 मुहूर्त हैं। 26, 29 और 30।

दिसंबर: साल 2020 के आखिरी माह में विवाह के 8 मुहूर्त हैं। 1, 2, 6, 7, 8, 9, 10 और 11।

खरमास में क्या न करें:

जब भी हम कोई मांगलिक कार्य करते हैं तो उसके फलित होने के लिए गुरु का प्रबल होना जरूरी है। धनु एवं मीन बृहस्पति ग्रह की राशियां हैं। खरमास के समय सूर्य इन दोनों राशियों में होते हैं, इसलिए शुभ कार्य नहीं होते। खरमास में गृह प्रवेश, गृह निर्माण, नए बिजनेस का प्रारंभ, शादी, सगाई, वधू प्रवेश आदि जैसे मांगलिक कार्य नहीं करना चाहिए।

इस बार खरमास में नवरात्रि-

इस बार नवरात्रि का प्रारंभ खरमास में हो रहा है। चैत्र नवरात्रि 25 मार्च से प्रारंभ हो रही है। इस दिन कलश स्थापना के सा​थ मां दुर्गा की आराधना प्रारंभ होगी। चैत्र नवमी 02 अप्रैल को है।

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से

Monday, March 9, 2020

499 साल बाद गुरु-शनि के दुर्लभ संयोग से घुलेंगे खुशियों के रंग

अमर उजाला नेटवर्क, बरेली Updated Fri, 06 Mar 2020 02:22 PM IST

प्रेम और हर्षोल्लास के पर्व होली पर अबकी बार ग्रह नक्षत्रों का कुछ ऐसा दुर्लभ संयोग बन रहा है, जो लोगों के जीवन में खुशियों के रंग घोलेगा। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक करीब 499 साल बाद इस साल होली के दिन गुरु और शनि अपनी-अपनी राशियों में रहेंगे। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र और सिंह राशि में होलिका का दहन होगा। अबकी बार भद्रा की कोई बाधा नहीं रहेगी। नौ मार्च को होलिका दहन और दस मार्च को होली खेली जाएगी।
ज्योतिषाचार्य डॉ. सौरभ शंखधार के मुताबिक, 3 मार्च, 1521 के बाद इस वर्ष होली पर मकर राशि में शनि ग्रह और गुरु अपनी धनु राशि में रहेंगे, जिसके चलते 499 साल बाद होली पर यह शुभ संयोग रहेगा। बताया कि इस बार पूर्णिमा सोमवार को पड़ रही है। गुरु और शनि इस बार सूर्य के नक्षत्र में उतराषाढ़ा में रहेंगे।

पूर्णिमा सोमवार को पड़ने के कारण पूर्वा पर्व नक्षत्र के बाद उत्तरा पर्व नक्षत्र है। इसमें होलिका पड़ने से कार्य क्षेत्र में वृद्धि होगी, साथ ही सौम्य योग होने से किसानों के लिए होली अच्छी रहने के आसार हैं। बताया कि होलिका दहन के समय इस वर्ष भद्राकाल की बाधा नहीं रहेगी। फाल्गुन माह की पूर्णिमा यानी होलिका दहन के दिन भद्राकाल सुबह सूर्योदय से शुरू होकर दोपहर करीब डेढ़ बजे ही खत्म हो जाएगा। इस तरह शाम को प्रदोष काल में यानी शाम 6.22 से 8.49 बजे तक होलिका दहन किया जा सकेगा। पूर्णिमा तिथि रात 11 बजे तक रहेगी।
ध्वज, गजकेसरी योग का संयोग
ज्योतिषाचार्य शंखधार के अनुसार, सोमवार, चंद्रमा का दिन माना गया है। नौ मार्च को सोमवार और पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र से ध्वज योग रहेगा, जो सभी राशि के जातकों को यश/कीर्ति व विजय प्रदान करेगा। पूर्णिमा तिथि होने से चंद्रमा का प्रभाव रहेगा। स्वराशि स्थित गुरु की दृष्टि चंद्रमा पर रहेगी, इससे गजकेसरी योग का प्रभाव रहेगा। तिथि-नक्षत्र और ग्रहों की विशेष स्थिति में होलिका दहन पर रोग, शोक और दोष का नाश होगा।

ग्रहों की राशि संग युति भी शुभ
होली पर शुक्र मेष राशि में, मंगल और केतु धनु राशि में, राहु मिथुन में, सूर्य और बुध कुंभ राशि में, चंद्र सिंह में रहेगा। ग्रहों के इन योगों में होली आने से ये शुभ फल देने वाली रहेगी। इस प्रकार का यह योग देश में शांति स्थापित करवाने में सफल होगा। व्यापार के लिए हितकारी रहेगा और लोगों में टकराव समाप्त होगा।
होलिका शुभ मुहूर्त
दहन: शाम 6.22 बजे से रात 8.49 बजे तक
भद्रा पूंछ - सुबह 9.37 बजे से 10.38 बजे तक
भद्रा मुख - सुबह 10.38 बजे से दोपहर 12.19 बजे तक
पूर्णिमा तिथि - सुबह 3.03 बजे से रात 11.16 बजे तक 

गुरू शनि के दुर्लभ संजोग से घुले खुशियों के रंग

गुरू शनि के दुर्लभ संजोग से  घुले खुशियों के रंग...

फाल्गुन मास पर्व - होली 9 मार्च 2020

होली पर 2 तरह के पर्व:

१. आध्यात्मिक साधनाओ के लिए विशेष

२. रंगों का त्योहार

१. आध्यात्मिक साधनाओ के लिए विशेष:
होलिका वास्तव में एक वैदिक यज्ञ है।
वैदिक यज्ञों में सोमयज्ञ सर्वोपरि है। वैदिक काल में प्रचुरता से उपलब्ध सोम लता का रस निचोड़ कर उससे जो यज्ञ संपन्न किए जाते थे वे सोमयज्ञ कहलाए।

 ब्राह्मण ग्रंथों में इसके अनेक विकल्प दिए हुए हैं जिनमें पूतीक, अर्जुन वृक्ष मुख्य हैं।

 अर्जुन वृक्ष को हृदय के लिए अत्यंत शक्तिप्रद माना गया, आयुर्वेद में अर्जुन की छाल हृदय रोग के निवारण के संदर्भ में प्रस्तुत है। महाराष्ट्र में सम्प्रति सोमयोग के अनुष्ठान में राषेर नामक वनस्पति का उल्लेख है।

 सोमरस इतना शक्ति वर्धक और उल्लास कारक होता है कि उसका पान कर वैदिक ऋषियों को अमरता जैसी अनुभूति प्राप्त हुई - 

अपाम सोमममृता अभूम(ऋग्वेद)

 होलिका में जलाए जाने वाली आग यज्ञ वेदी में निहित अग्नि का प्रतीक है। यज्ञ वेदी के समीप एक गुलर की टहनी गाड़ी जाती है क्योंकि गूलर का फल माधुर्य की दृष्टि से सर्वोपरि माना गया।

गूलर का फल मीठा होता है कि पकते ही इसमें कीड़े पड़ने लगते हैं। फागुन पूर्णिमा  की रात्रि तंत्र मंत्र विशेष साधना सीखने के लिए सर्वोत्तम हैं, कुछ साधको के जो लंबे समय से अनुष्ठान व तंत्र प्रयोग सीख रहे हैं उनके लिए आज पूर्णाहुति का विशेष योग है।

2. रंगो का त्योहार होली:

 इस पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ भी कहा गया। खेतों में नवीन अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने की परंपरा है, इस अन्न को होलिकोत्सब कहते हैं।

 इसी से इसका नाम होलाष्टक पड़ा। होली का उत्सव मनाने के संबंध में अनेक मत प्रचलित हैं।

1. ऐसी मान्यता है कि इस पर्व का संबंध काम दहन से है, भगवान शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, तभी से यह त्यौहार का प्रचलन हुआ।

2. फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा पर्यंत आठ दिन होलाष्टक मनाया जाता है, भारत के कई प्रदेशों में होलाष्टक शुरू होने पर एक पेड़ की लकड़ी काटकर उसमें रंग बिरंगे कपड़े के टुकड़े बांधे जाते हैं इस शाखा को जमीन में गाड़ दिया जाता है।
 सभी लोग इसके नीचे होलिकोत्सव बनाते हैं।

 3. यह त्यौहार हिरणाकश्यप की बहन की स्मृति में मनाया जाता है, उनकी बहन होलिका वरदान के प्रभाव से अग्नि स्नान करती थी लेकिन जलती नहीं थी अपनी बहन से प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्निस्नान करने को इसलिए कहा गया कि प्रह्लाद जल जाएगा, और होलीका बच जाएगी। जिसमे होलीका जल गई और प्रह्लाद बच गए। इसी कारण त्यौहार  मनाने की प्रथा चल पड़ी।

4. इस दिन आम मंजरी और चंदन को मिलाकर खाने का बड़ा महत्व कहते हैं, जो लोग फाल्गुन पूर्णिमा पर एकाग्र चित्त से डोले में झूलते हुए श्री कृष्ण गोविंद के दर्शन करते हैं उनको निश्चय ही बैकुण्ठ लोक प्राप्त होता है।

9 मार्च को फाल्गुन पूर्णिमा पर होलिका दहन होगा और मंगलवार 10 मार्च को होली खेली जाएगी। सोमवार को होलिका दहन होना शुभ संयोग है।

499 साल के बाद बन रहा है। इस साल होली पर गुरु स्वराशि धनु और शनि स्वराशि मकर में रहने से विशेष योग बन रहा है।

 पहले इन दोनों ग्रहों का ऐसा योग 3 मार्च 1521 को बना था, तब भी ये दोनों ग्रह अपनी-अपनी राशि में ही थे।
 होली पर शुक्र मेष राशि में, मंगल और केतु धनु राशि में, राहु मिथुन में, सूर्य और बुध कुंभ राशि में, चंद्र सिंह में रहेगा।

 ग्रहों के इन योगों में होली आने से ये शुभ फल देने वाली रहेगी। इस प्रकार का यह योग देश में शांति स्थापित करवाने में सफल होगा। व्यापार के लिए हितकारी रहेगा और लोगों में टकराव समाप्त होगा।

 हर साल जब सूर्य कुंभ राशि में और चंद्र सिंह राशि में होता है, तब होली मनाई जाती है।

3 मार्च से शुरू हो गया है, पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से पूर्णिमा तक होलाष्टक रहता है। होलाष्टक में सभी तरह के शुभ कर्म वर्जित रहते हैं। इन दिनों में पूजा-पाठ और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व है।

होलिका दहन मुहूर्त- 9 मार्च 2020 शाम 6 बजकर 22 मिनट से रात 8 बजकर 49 मिनट तक 18:22 से 20:49

भद्रा पूंछ- सुबह 9 बजकर 37 मिनट से 10 बजकर 38 मिनट तक

भद्रा मुख- 10 बजकर 38 मिनट से दोपहर 12 बजकर 19 मिनट तक

पूर्णिमा तिथि आरंभ- सुबह 3 बजकर 3 मिनट से (9 मार्च 2020)

पूर्णिमा तिथि समाप्त- रात 11 बजकर 16 मिनट तक (9 मार्च 2020)

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से