Saturday, June 20, 2020

गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी( 1 जून 2020)

गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी( 1 जून 2020)

 गंगा जी देवनदी हैं, वे मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए धरती पर आई, धरती पर उनका अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को हुआ।

 अतः यह तिथि उनके नाम पर गंगा दशहरा के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी संवत्सर का मुख कही जाती है।

 ज्येष्ठस्य शुक्लादशमी संवत्सरमुखा स्मृता
तस्यां स्नानं प्रकुर्वीत दानं चैव विशेषत:

 इस तिथि को गंगा स्नान एवं श्री गंगा जी के पूजन से 10 प्रकार के पापों (3 कायिक, 4 वाचिक तथा 3 मानसिक) का नाश होता है इसलिए ऐसे दशहरा कहा गया।

 पूजा में 10 प्रकार के पुष्प,  दशांग धूप, दीपक, 10 प्रकार के नैवेद्य, 10 तांबूल तथा 10 फल होने चाहिए, दक्षिणा भी 10 ब्राह्मणों को देना चाहिए।

दशहरा में दस योग होते हैं, ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, बुधवार, हस्त नक्षत्र,व्यतिपात, गर, आनंद, कन्या के चंद्रमा और वृष के सूर्य।

 उसमें जिस दिन योग अधिक हो तथा दशमी पूर्वाहन में मिलती हो उस दिन दशहरा करें।

 यदि दो दिन पूर्व में दशमी तिथि प्राप्त होने पर जिस दिन योग बाहुल्य हो उस दिन करें।

यहां पर सोमवार, मंगलवार तथा बुधवार का कल्पभेद से व्यवस्था है, और इस दशमी को जिस दिन योग बाहुल्य हो उसी को ग्रहण करें, क्योंकि योगाधिक्य में फलाधिक्य अधिक होता है।

निर्जला एकादशी: (२ जून 2020)

ज्येष्ठ  मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है।

 अन्य महीनों की एकादशी को फलाहार किया जाता है परंतु इस एकादशी को जलग्रहण करना भी निषेध है।

  व्यास जी के आदेशानुसार भीमसेन ने एकादशी का व्रत किया था, इसलिए यह एकादशी भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

स्कंद पुराण का मत है की ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है, उसमें निर्जला उपवास कर जल से भरे हुए कुंभो तथा चीनी के सहित  ब्राह्मणों या मंदिर में देने से विष्णु के सानिध्य में हर्ष होता है।

विशेष:

आषाढ़ मास (6 जून से 5 जुलाई) में पांच शनिवार तथा पांच रविवार आने से रविवारी संक्रांति (14 जून), 28 जून तक गुरु शुक्र मध्य नव पंचक योग रहने से तथा 21 जून को रविवारी अमावस्या के दिन कंकण सूर्यग्रहण घटित होने से आवश्यक वस्तुओं जैसे दूध, ईधन, सब्जियां, तेल आदि के भाव में अत्यधिक तेजी सामान्य लोगों में क्लिष्ट रोगों की उत्पत्ति, लोगों में पारस्परिक प्रेम की कमी तथा पूर्वोत्तर दिशा में कहीं राज भंग, अग्निकांड, युद्धआदि का भय हो।

शुक्र अस्त 31 मई 2020:

शुक्र ग्रह 31 मई  2020 रविवार को पश्चिम में अस्त हो जाएंगे। शुक्र ग्रह के अस्त होने से विवाह जैसे सभी मांगलिक कार्य बंद हो जाएंगे।

 शुक्र ग्रह का उदय 9 जून 2020 को होगा, इसके बाद मांगलिक कार्य हो सकेंगे।

शुक्र ग्रह का वर्तमान समय में भ्रमण अपनी राशि वृष में रोहिणी नक्षत्र में हो रहा है।

 इसी नक्षत्र में सूर्य ग्रह के आ जाने के कारण शुक्र ग्रह 31 मई 2020 को पश्चिम दिशा में शाम 7:16 बजे अस्त हो जाएंगे। इसका उदय 9 जून 2020 को पूरव दिशा में होगा।

शुक्र के अस्त होने से महंगाई बढ़ेगी और सूती, चावल, दूध, दही, घी में तेजी का रुख रहेगा।

 लग्नेश शुक की महादशा, अंतर्दशा में शुक्र अस्त होने से सभी कार्य मे विलंब होने के योग बनेंगे।

जन्मपत्री में अकारक ग्रह शुक्र सभी कार्यो का समाधान करने के योग बनेंगे।

 निषेध कार्य:

शुक्र ग्रह के अस्त होने तक विवाह, मुंडन, नूतन गृह प्रवेश, निर्माण कार्य प्रारंभ करना शास्त्र सम्मत नहीं रहता है।

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से

नवतपा (नौतपा) विशेष

नवतपा (नौतपा) विशेष
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प्रतिवर्ष एक प्राकर्तिक खगोलीय घटनाहोती है जिसे नौतपा कहते हैं।  ज्येष्ठ महीने के शुक्लपक्ष की तृतीया तिथि यानी 25 मई को सूर्य कृतिका से रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेगा और 8 जून तक इसी नक्षत्र में रहेगा। सूर्य के नक्षत्र बदलते ही नौतपा शुरू हो जाएगा। इसकी वजह यह है कि इस दौरान सूर्य की लंबवत किरणें धरती पर पड़ती हैं। लेकिन इस बार शुक्र तारा अस्त होने से इसका प्रभाव कम रहेगा।

क्या होता है नौतपा, इसे समझते हैं।

सूर्य के रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करते ही नौतपा शुरू हो जाता है, विगत कुछ वर्षों से सूर्य नारायण लगभग 25 मई को ही रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश कर रहे थे इस वर्ष भी सूर्यदेव रोहिणी नक्षत्र में 24 मई की रात्रि को 2 बजकर 32 मिनट पर प्रवेश करेगें जो 8 जून तक इसी नक्षत्र में रहेगा।
इन दिनों के प्रथम 9 दिन यानी 25 मई से 2 जून तक नवतपा माना जायेगा।

नौतपा साल के वह 9 दिन होते है जब सूर्य पृथ्वी के सबसे नजदीक रहता है जिस कारण से इन 9 दिनों में भीषण गर्मी पड़ती है इसी कारण से इसे नौतपा कहते हैं।

ज्योतिष गणना के अनुसार, जब सूर्य रोहिणी नक्षत्र में 15 दिनों के लिए आता है तो उन पंद्रह दिनों के पहले नौ दिन सर्वाधिक गर्मी वाले होते हैं। इन्हीं शुरुआती नौ दिनों को नौतपा के नाम से जाना जाता है। खगोल विज्ञान के अनुसार, इस दौरान धरती पर सूर्य की किरणें सीधी लम्बवत पड़ती हैं। जिस कारण तापमान अधिक बढ़ जाता है। कई ज्योतिषी मानते हैं कि यदि नौतपा के सभी दिन पूरे तपें, तो यह अच्छी बारिश का संकेत होता है।

सूर्य के वृष राशि के 10 अंश से 23 अंश 40 कला तक नौतपा कहलाता है। इस दौरान तेज गर्मी रहने पर बारिश के अच्छे योग बनते है। सूर्य 8 जून तक 23 अंश 40 कला तक रहेगा।

दरअसल रोहिणी नक्षत्र का अधिपति ग्रह चंद्रमा होता है। सूर्य तेज और प्रताप का प्रतीक माना जाता है जबकि चंद्र शीतलता का प्रतीक होता है। सूर्य जब चंद्र के नक्षत्र रोहिणी में प्रवेश करता है तो सूर्य इस नक्षत्र को अपने प्रभाव में ले लेता है जिसके कारण ताप बहुत अधिक बढ़ जाता है। इस दौरान ताप बढ़ जाने के कारण पृथ्वी पर आंधी और तूफान आने लगते है।  
इन दिनों में शरीर तेज़ी से डिहाइड्रेट होता है जिसके कारण डायरिया, पेचिस, उल्टियां होने की संभावना बढ़ जाती है अतः नीम्बू पानी, लस्सी, मट्ठा (छांछ), खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूजे का भरपूर प्रयोग करें, बाहर निकलते समय सिर को ढक कर रखें अन्यथा बाल बहुत तेज़ी से सफेद होंगे, झड़ेंगे।

एक दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार चंद्रमा जब ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष में आर्द्रा से स्वाति नक्षत्र तक अपनी स्थितियों में हो एवं तीव्र गर्मी पड़े, तो वह नवतपा है। मानना है कि सूर्य वृष राशि में ही पृथ्वी पर आग बरसाता है और खगोल शास्त्र के अनुसार वृषभ तारामण्डल में यह नक्षत्र हैं कृतिका, रोहिणी और मृगशिरा (वृषभो बहुलाशेषं रोहिण्योऽर्धम् च मृगशिरसः) जिसमें कृतिका सूर्य, रोहिणी चंद्र, मृगशिरा मंगल अधिकार वाले नक्षत्र हैं इन तीनों नक्षत्रों में स्थित सूर्य गरमी ज्यादा देता है ।

अब प्रश्न यह कि इन तीनों नक्षत्रों में सर्वाधिक गरम नक्षत्र अवधि कौन होगा इसके पीछे खगोलीय आधार है इस अवधि मे सौर क्रांतिवृत्त में शीत प्रकृति रोहिणी नक्षत्र सबसे नजदीक का नक्षत्र होता है।
जिसके कारण सूर्य गति पथ में इस नक्षत्र पर आने से सौर आंधियों में वृद्धि होना स्वाभाविक है इसी कारण परिस्थितिजन्य सिद्धांत कहता है कि जब सूर्य वृष राशि में रोहिणी नक्षत्र में आता है उसके बाद के नव चंद्र नक्षत्रों का दिन नवतपा है ।

नौतपा की पौराणिक परंपरा
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परंरपरा के अनुसार नौतपा के दौरान महिलाएं हाथ पैरों में मेहंदी लगाती हैं। क्योंकि मेहंदी की तासीर ठंडी होने से तेज गर्मी से राहत मिलती है। इन दिनों में पानी खूब पिया जाता है और जल दान भी किया जाता है ताकि पानी की कमी से लोग बीमार न हो। इस तेज गर्मी से बचने के लिए दही, मक्खन और दूध का उपयोग ज्यादा किया जाता है। इसके साथ ही नारियल पानी और ठंडक देने वाली दूसरी और भी चीजें खाई जाती हैं।

शुक्र तारा अस्त होने का प्रभाव
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इस बार नौतपा के दौरान 30 मई को शुक्र ग्रह वक्री होकर अपनी ही राशि में अस्त हो जाएगा और सूर्य के साथ रहेगा। रोहिणी नक्षत्र का का स्वामी ग्रह चंद्रमा है। सूर्य के साथ शुक्र भी वृषभ राशि में रहेगा। शुक्र रस प्रधान ग्रह है, इसलिए वह गर्मी से राहत भी दिलाएगा। इसलिए देश के कुछ हिस्सों में बूंदाबांदी और कुछ जगहों पर तेज हवा और आंधी-तूफान के साथ बारीश होने की संभावना ज्यादा है। नौतपा के आखिरी दो दिन तेज हवा-आंधी चलने व बारिश होने के भी योग बन रहे हैं। वराहमिहिर के बृहत्संहिता ग्रंथ में ने बताया है कि ग्रहों के अस्त होने से मौसम में बदलाव होता है।

बारिश के योग
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इस वर्ष प्रमादी नामक संवत्सर के राजा बुध है और रोहिणी का निवास संधि में है। इससे बारीश तो समय पर आ जाएगी लेकिन कहीं पर ज्यादा तो कहीं पर कम बारिश हो सकती है। इस बार देश के रेगिस्तानी और पर्वतीय इलाकों में ज्यादा बारीश हो सकती है। बारीश के कारण अनाज और धान की पैदावार अच्छी रहेगी। धान्य, दूध व पेय पदार्थों में तेजी रहेगी। जौ, गेहूं, राई, सरसों, चना, बाजरा, मूंग की पैदावार आशानुकूल होगी।

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से

जून 2020 में होने वाले परिवर्तन:

जून 2020 में होने वाले परिवर्तन:

गंगा दशहरा 1 जून

निर्जला एकादशी 2 जून

उपच्छाया चंद्र ग्रहण ( 5/6 जून) : भारत मे अमान्य

मिथुन संक्रांति ( सूर्य का मिथुन राशि मे प्रवेश) 14 जून

मीन राशि मे मंगल का प्रवेश 18 जून

21 जून कंकड़ सूर्य ग्रहण

गुप्त नवरात्रि 22 जून

भद्दली नवमी (अबूझ तिथि) 29 जून

गुरु का स्वराशि (धनु) में प्रवेश 30 जून


गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ल दशमी( 1 जून 2020)

 गंगा जी देवनदी हैं, वे मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए धरती पर आई, धरती पर उनका अवतरण ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी को हुआ।

 अतः यह तिथि उनके नाम पर गंगा दशहरा के नाम से प्रसिद्ध हुई।

ज्येष्ठ शुक्ल दशमी संवत्सर का मुख कही जाती है।

 ज्येष्ठस्य शुक्लादशमी संवत्सरमुखा स्मृता
तस्यां स्नानं प्रकुर्वीत दानं चैव विशेषत:

 इस तिथि को गंगा स्नान एवं श्री गंगा जी के पूजन से 10 प्रकार के पापों (3 कायिक, 4 वाचिक तथा 3 मानसिक) का नाश होता है इसलिए ऐसे दशहरा कहा गया।

 पूजा में 10 प्रकार के पुष्प,  दशांग धूप, दीपक, 10 प्रकार के नैवेद्य, 10 तांबूल तथा 10 फल होने चाहिए, दक्षिणा भी 10 ब्राह्मणों को देना चाहिए।

दशहरा में दस योग होते हैं, ज्येष्ठ मास, शुक्ल पक्ष, दशमी तिथि, बुधवार, हस्त नक्षत्र,व्यतिपात, गर, आनंद, कन्या के चंद्रमा और वृष के सूर्य।

 उसमें जिस दिन योग अधिक हो तथा दशमी पूर्वाहन में मिलती हो उस दिन दशहरा करें।

 यदि दो दिन पूर्व में दशमी तिथि प्राप्त होने पर जिस दिन योग बाहुल्य हो उस दिन करें।

यहां पर सोमवार, मंगलवार तथा बुधवार का कल्पभेद से व्यवस्था है, और इस दशमी को जिस दिन योग बाहुल्य हो उसी को ग्रहण करें, क्योंकि योगाधिक्य में फलाधिक्य अधिक होता है।


निर्जला एकादशी: (२ जून 2020)

ज्येष्ठ  मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है।

 अन्य महीनों की एकादशी को फलाहार किया जाता है परंतु इस एकादशी को जलग्रहण करना भी निषेध है।

  व्यास जी के आदेशानुसार भीमसेन ने एकादशी का व्रत किया था, इसलिए यह एकादशी भीमसेनी एकादशी के नाम से भी प्रसिद्ध है।

स्कंद पुराण का मत है की ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है, उसमें निर्जला उपवास कर जल से भरे हुए कुंभो तथा चीनी के सहित  ब्राह्मणों या मंदिर में देने से विष्णु के सानिध्य में हर्ष होता है।

प्रथम उपच्छाया चंद्रग्रहण:

प्रथम उपच्छाया चंद्रग्रहण 5 / 6 जून 2020 (शुक्र / शनि) यह अच्छा या चंद्र ग्रहण आरंभ से समाप्ति तक भारत में देखा जा सकेगा।

 ध्यान रहे उपच्छाया चंद्रग्रहण वास्तव में चंद्रग्रहण नहीं होता, इस ग्रहण की समय अवधि में चंद्रमा की चांदनी में कुछ धुंधलापन सा जाता है।

इसे ग्रहण की मान्यता नहीं होगी। किसी तरीके का सूतक का विचार नहीं होगा।


कंकण (चूड़ामणि) सूर्य ग्रहण (21 जून 2020 आषाढ़ अमावस रविवार):

 इस कंकण आकृति सूर्य ग्रहण 21 जून 2020 की प्रातः से दोपहर तक संपूर्ण भारत में खंडग्रास के रूप में दिखाई देगा।

 इस ग्रहण की कंकण आकृति केवल उत्तरी राजस्थान, उत्तरी हरियाणा तथा उत्तराखंड राज्य के उत्तरी क्षेत्र में से गुजरेगी।

भारत के अतिरिक्त यह ग्रहण दक्षिण पूर्वी यूरोप,ऑस्ट्रेलिया के केवल उत्तरी क्षेत्रों गियाना, फिजी, अधिकतर अफ्रीका (दक्षिण देशों को छोड़कर), प्रशांत ब हिंद महासागर, मध्य पूर्वी एशिया (अफगानिस्तान, पाकिस्तान, मध्य दक्षिण चीन, फिलीपींस) में दिखाई देगा।

ग्रहण का समय:

ग्रहण प्रारंभ:            09:15:58
परम ग्रास (मध्य):    12:10:04
ग्रहण समाप्ति:         15:04:01


भड़ल्या नवमी के दो दिन बाद ही सो जाएंगे देव, फिर पांच माह तक नहीं हो सकेंगे मांगलिक कार्य।

आषाढ़ मास (6 जून से 5 जुलाई) में पांच शनिवार तथा पांच रविवार आने से रविवारी संक्रांति (14 जून), 28 जून तक गुरु शुक्र मध्य नव पंचक योग रहने से तथा 21 जून को रविवारी अमावस्या के दिन कंकण सूर्यग्रहण घटित होने से आवश्यक वस्तुओं जैसे दूध, ईधन, सब्जियां, तेल आदि के भाव में अत्यधिक तेजी सामान्य लोगों में क्लिष्ट रोगों की उत्पत्ति, लोगों में पारस्परिक प्रेम की कमी तथा पूर्वोत्तर दिशा में कहीं राज भंग, अग्निकांड, युद्धआदि का भय हो।

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से

वट सावित्री व्रत ( ज्येष्ठ कृष्णा अमावस्या )



वट सावित्री व्रत ( ज्येष्ठ कृष्णा अमावस्या ), शनि जयंती 22 मई 2020

वट सावित्री व्रत ( ज्येष्ठ कृष्णा अमावस्या ), शनि जयंती  22 मई 2020

वट सावित्री व्रत ( ज्येष्ठ कृष्णा अमावस्या ), शनि जयंती  22 मई 2020

 वटवृक्ष के मूल में भगवान ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अग्र भाग में देवाधिदेव शिव का वास है।

देवी सावित्री भी वट वृक्ष में प्रतिष्ठित रहती हैं।  प्रयागराज में गंगा के तट पर वेणी माधव के निकट अक्षय वट प्रतिष्ठित है।

 भक्त शिरोमणि तुलसीदास ने संगम में स्थित अक्षय वट को तीर्थराज कहा,  इसी प्रकार तीर्थों में पंचवटी का स्थान विशेष है।

पांच वट से युक्त स्थान को पंचवटी कहा गया। हानिकारक गैसों को नष्ट कर वातावरण को शुद्ध करने में वटवृक्ष का विशेष महत्व है।

 वट वृक्ष की औषधि के रूप में उपयोगिता से सभी लोग परिचित हैं, जैसे वटवृक्ष दीर्घकाल तक अक्षय बना रहता है उसी तरह दीर्घायु और सौभाग्य की प्राप्ति के लिए वटवृक्ष की साधना की जाती है।

 इसके नीचे सावित्री ने अपने पति को पुनर्जीवित किया था तब से यह व्रत वट सावित्री व्रत के नाम से जाना जाता है।

 सौभाग्यवती स्त्रियों का भी पूजन होता है कुछ महिलाएं केवल अमावस्या कोई एक दिन का व्रत करती हैं, अमावस्या को उपवास करना चाहिए अगले दिन पारण करना चाहिए ऐसा भी मत है।

वट सावित्री अमावस्या मुहूर्त:

अमावस्या तिथि प्रारम्भ - मई 21, 2020 को रात्रि 21:35  बजे
अमावस्या तिथि समाप्त - मई 22, 2020 को रात्रि 23:08  बजे

महत्व:

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह माना जाता है कि वट (बरगद) का पेड़ ‘त्रिमूर्ति’ को दर्शाता है, जिसका अर्थ है भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्माऔर
भगवान शिव का प्रतीक होना। इस प्रकार, बरगद के पेड़ की पूजा करने से भक्तों को सौभाग्य प्राप्त होता है।

इस व्रत के महत्व और महिमा का उल्लेख कई धर्मग्रंथों और पुराणों जैसे स्कंद पुराण, भविष्योत्तर पुराण, महाभारत आदि में भी मिलता है।

वट सावित्री व्रत और पूजा हिंदू विवाहित महिलाओं द्वारा की जाती है ताकि उनके पति को समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति हो।

वट सावित्री व्रत का पालन एक विवाहित महिला द्वारा अपने पति के प्रति समर्पण और सच्चे प्यार का प्रतीक है।

हिन्दू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को शनि जयंती को भी मनाई जाती है।

शनि के अधिदेवता प्रजापति ब्रह्मा और प्रत्यधिदेवता यम हैं।

 फलित ज्योतिष के अनुसार शनि को न्यायाधीश माना जाता है।

नव ग्रहों में शनि का स्थान सातवां है। ये एक राशि में तीस महीने तक रहते हैं तथा मकर और कुंभ राशि के स्वामी माने जाते हैं।

 शनि की महादशा 19 वर्ष तक रहती है।

शनि जयंती पूरे उत्तर भारत में पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह की अमावस्या को मनाई जाती है।

दक्षिणी भारत के अमावस्यांत पंचांग के अनुसार शनि जयंती वैशाख अमावस्या को मनाई जाती है। 

उत्तर भारत में ज्येष्ठ अमावस्या को शनि जयंती के साथ-साथ वट सावित्री व्रत भी रखा जाता है।

शनि शांति के उपाय:

पितरो की शांति के लिए तथा शनि के कुप्रभावों को दूर करने के लिए अमावस्या सर्वोत्तम है।

श्री हनुमान जी की साधना से शनि अनुकूल फल ही देते हैं। हनुमान चालीसा, बजरंग बाण पढ़िए।

न्यायप्रिये देव शनि हमेशा ही बड़े बूढ़ों की सेवा से प्रसन्न हुए हैं।

गरीबो की सेवा कीजिये, बड़े लोगो का सम्मान कीजिये।

प्रत्येक शनिवार को वट और पीपल वृक्ष के नीचे सूर्योदय से पूर्व कड़वे तेल का दीपक जलाकर शुद्ध कच्चा दूध एवं धूप अर्पित करें।

 यदि शनि की साढ़ेसाती से ग्रस्त हैं तो शनिवार को अंधेरा होने के बाद पीपल पर मीठा जल अर्पित कर सरसों के तेल का दीपक और अगरबत्ती लगाएं और वहीं बैठकर क्रमशः हनुमान, भैरव और शनि चालीसा का पाठ करें और पीपल की सात परिक्रमा करें।

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से

ज्योतिष के अनुसार बड़े बदलाव का समय, होंगे कई परिवर्तन (https://www.theindiarise.com/)

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ये समय है बदलाव का। इंसान,प्रकृति ,वन्य जीव, सब बदल रहे है अपनी अपनी चाल ढाल और इसी तरह हमारे गृह नक्षत्र भी बदल रहे है अपनी चाल, अपना घर व अपना स्वाभाव जो असर डालेगा मौसम, जन जीवन व  देश विदेश की परिस्थिति पे ।
ज्येष्ठ मास (8 मई से 5 जून 2020) तक 5 शुक्रवार होने से, 29 मई तक कालसर्प योग रहने से तथा गुरु शनि के योग से विश्व में युद्ध से वातावरण अशांत एवं  असमंजसता बढ़े।  दूध, तेल, जल, घी आदि दैनिक उपयोगी वस्तुओं में विशेष तेजी के योग बने। मिथुन के राहु के प्रभाव के कारण दैवीय दुर्घटनाये जैसे भू स्खलन, जल द्वारा क्षति, आंधी ओले बिना समय बरसात का होना भी संभव हैं जो हानिकारक होगा।
ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार बताते है कि 14 मई को सूर्य वृष राशि में 5:33 बजे शाम को प्रवेश करेगा।
 वृष संक्रान्ति का पुण्य काल 14 मई को 10:19 बजे सुबह से शुरु होकर शाम 5:33 बजे शाम तक रहेगा। सूर्य जब वृषभ राशि में संक्रमण करते हैं तो इसे वृष संक्रांति कहा जाता है इस दिन सूर्योदय से पहले किसी पवित्र नदी में स्नान और व्रत का  विधान है, इस दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है। जहां सूर्य देव 15 जून तक रहेंगे। सूर्य का राशि परिवर्तन संक्रांति कहा जाता है।
सूर्य के वृषभ राशि में प्रवेश के समय की कुंडली में सूर्य का शुभ ग्रहों बुध और शुक्र से युत होकर मंगल से दृष्ट होना दक्षिण भारत में मानसून  पूर्व की अच्छी वर्षा का संकेत है।
उत्तर भारत में मंगल और सूर्य के इस गोचर के प्रभाव से तापमान 14 मई के बाद तेज़ी से बढ़ेगा जिसके फलस्वरूप कई स्थानों पर व्यापारिक गतिविधियां तेज होंगी। वे कहते है, कि जहाँ सोने-चांदी के रुख में तेजी आएगी वहीँ पानी की कमी से जनता त्रस्त हो सकती है।
सूत्रों क अनुसार 14 मई से 8 जून तक गर्मी अपने प्रचंड रूप में दिखाएगी, दैवीय आपदा ( अति वृष्टि, भूकंप, सुनामी, चक्रवात) योग बनेंगे। सूर्य की वृषभ संक्राति में 25 मई से *नौतपा*(आम भाषा में कहें तो वो नौ दिन जिन में में सूर्य कि तपन अपने चरम पे होती है ) शुरू हो रहा है। इस दिन सूर्य रोहिणी नक्षत्र में प्रवेश करेंगे। और यह नौतपा 8 जून तक चलेंगा।

Sunday, May 17, 2020

वक्री शनि गोचर 11 मई 2020

वक्री शनि गोचर 11 मई 2020...

वक्री गति:

 जब कोई ग्रह अपनी तेज गति के कारण किसी अन्य ग्रह को पीछे छोड़ देता है तो उसे अतिचारी कहा जाता है। जब कोई ग्रह अपनी धीमी गति के कारण पीछे की ओर खिसकता प्रतीत होता है तो उसे वक्री कहते हैं।

कोई भी ग्रह चाहें वक्री हो या फिर मार्गी, वह अपनी उच्च राशि में अच्छा फल देता है, जबकि नीच राशि में वह अशुभ फलकारी होता है।

शनि देव 11 मई 2020 को प्रातः 9:40 से 29 सितंबर 2020  10:40 तक स्वराशि मकर में वक्री होंगे।

परिणाम : न्यायिक व्यवस्था में सुधार, न्यायिक ढांचे का पुनर्गठन, सभी का कौशल सामने आएगा, व्यवहारिकता के साथ प्रेम बढ़ेगा।

राशि के हिसाब से परिवर्तन :

शनि की वक्री गति का प्रभाव कुछ राशियों ( मेष, वृष, मिथुन, तुला, धनु, मकर तथा कुम्भ राशि ) पर विशेष होगा।

कर्क, सिंह, कन्या, वृश्चिक, मीन राशि पर सामान्य प्रभाव रहेगा। इन सभी राशियों के  जातक कृष्णाजी , शिवजी, हनुमान जी तथा भगवती की उपासना से शुभता प्राप्त करेंगे।

मेष राशि:

शनि के वक्री होने से कष्ट संभव। खर्च अधिक हो, स्वास्थ्य पर ध्यान दीजिए। मौन साधना श्रेष्ठ होगी, भगवती की साधना से सभी प्रकार सुख संभव।

वृष राशि:

 पारिवारिक कलेश बढ़ने के योग, वाणी पर गहरा संयम, नकारात्मकता न आने दे।
ध्यान कीजिये। सेवा करने से लाभ मिले। गणेश जी की साधना शुभ हो।

मिथुन राशि:

शनि की ढैय्या, शनि का वक्र गति परेशानी बढ़े, मानसिक तथा आर्थिक कष्ट संभव। बजरंग वाण के 11 पाठ कीजिये सभी प्रकार शुभता हो।

तुला राशि:

शनि की ढैय्या,  वक्री हो जाने से परेशानियों में बढ़े,  व्यापार में नुकसान संभव, मौन साधना लाभ प्रद हो, हनुमान जी चालीसा के 21 पाठ करे, शुभता होगी।

धनु राशि:

साढ़े साती का अंतिम चरण, पैरो में दर्द बढ़े। कठिन परिश्रम, लाभ कम। दुर्घटना के योग बने। भैरव जी की मानसिक पूजा करे।

मकर:

साढ़े साती के दूसरे चरण की शुरुआत, पेट संबंधी रोग, जीवनसाथी से मतभेद इत्यादि। शिव पूजा से सब कुछ अनुकूल बने।

कुंभ:

साढ़े साती के पहले चरण, शनि के वक्री होने से कुंभ राशि वालों को सावधान रहना होगा। पारिवारिक जीवन में समस्याएं, सोच समझकर कार्य करे। हनुमान जी की उपासना करें।

9 मई 2020 से 24 मई 2020 तक प्रकृति में काल सर्प योग बनने के कारण लाभ तथा हानि के योग भी बन सकते हैं।

ज्येष्ठ मास (8 मई से 5 जून 2020) तक 5 शुक्रवार होने से, 29 मई तक कालसर्प योग रहने से तथा गुरु शनि के योग से विश्व में युद्ध से वातावरण अशांत एवं  असमंजसता बढ़े।  दूध, तेल, जल, घी आदि दैनिक उपयोगी वस्तुओं में विशेष तेजी के योग बने।

मिथुन के राहु के प्रभाव के कारण दैवीय दुर्घटनाये जैसे भू स्खलन, जल द्वारा क्षति, आंधी ओले बिना समय बरसात का होना भी संभव हैं जो हानिकारक होगा।

ज्योतिर्विद डॉ0 सौरभ शंखधार की डेस्क से